किसका किस्सा कैसी बातों में तुम उलझते हो मेरे मन? तेरे डोर में उलझी हुई हर बात का इतना ही मोल है कि जैसे तुम एक पानी का बुलबुला हो जिसके मकसद उस कटी पतंग जैसा है जिसकी उड़ान बेतरतीबी की हदों को अनुभव कर चुका है तेरा हर एक उड़ान इस बात का गवाह रहा है कि तेरे पंख हवा से बातें कर जमीं पर ही लौट जाते हैं तेरा शोहरत एक दिन मज़ार बन जायेगा जिसके नींद के इर्दगिर्द सपनों का कारवां घूमता फिरेगा तुम्हारे पेशानी पे जो ये लकीरें हैं वो बता रही है की तुम अभी अभी जिम्मेदार बने हो तेरे जिम्मे कुछ खुशियाँ कुछ ग़म मिलेंगे उसके सहारे उम्र तो कट ही जायेगी बस यादों के बक्से से निकाल कर तुम शीशे में ख़ुद को झांकते रहना एक अजनबीपन का एहसास तुम्हें जिंदा रखेगा आजतक तुम्ही तुम अनजान रहे हो तो जाने-पहचाने नाम का क्या करना? और जाने-पहचाने रिश्तों से क्या वास्ता? तेरा तुझसे रिश्ता कुछ कदर है जैसे एक मन अपने सपने को देखता है जैसे एक चकोर चाँद को तकता रहता है जैसे एक धड़कन दिल से जुड़ा रहता है
There is something in everything and everything in something.