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Showing posts from June, 2025

फ़ितरत

आदत नहीं हमें कि चंद सिक्कों पे लूट जाना है ज़मीर के सौदागर हमने पग-पग पे देखे हैं उल्फ़त की आँधी हो या बेचैनी का शैलाब जो राह पकड़ के चल पड़ा उसे कश्ती मिल ही जाना है देखे है हमनें बड़े पत्थर दिल वाले जो दिल को छू जाए वही जीवन को जाना है जो बात तोड़-जोड़ कर निकले उन्हीं बांतों में जमाना है अदा जब अश्क़ बन जाए सदायें ख़ुद से ख़ुदा हो जाना है ये कैसी नादानी है कि खिलौनों को खिलौने का शौक है तेरा गुरुर एक बुलबुले सा है कुछ पल में ही मिट जाना है तूने मन के लिबास पे  जो कलिखें पोत रखी है उस मलिन मन के भीतर वो बच्चा जो शांत सा बैठा है क्या तुमने कभी उसे पहचाना है?

Birth of Name

Name, you are chasing and chased by You, do you really matter? What if you don’t exist? What if you’re a funny fiction; Invented by a few, fallen from spontaneity? Your fictitious glory is taken for granted As if, you are the beginning and the end You, the first and the final dogma The weaver of the life-stories The gene of romance and tragedy You, the fulcrum of human power The traces of memories  Whose erasure is truly a liberation From the burdening flashes of thy presence! Yet, you are blooming In an Age of Reason and Anxiety!