वो अल्हड़ सा मनमौजी समय था
जब चढ़ते हुए सूरज के आँगन में
हम क्रिकेट खेला करते थे।
वो गाँव में दशहरे का समय
जब छोटे-छोटे बच्चे मेला जाया करते थे
मेले से लाये गए खिलौने
को संजो कर रखा करते थे।
वो शाम में रेडियो के आसपास बैठे
गाँव के बुजुर्ग राजनीति पे छीटा-कसी किया करते थे।
पूरे गाँव में टेलीविज़न का एक सेट होता था
जिसके एंटीने के पेचाकसी में पूरा धारवाहिक गुजर जाता था।
जबसे विकाश की नई बयार बही है
गाँव आज शहर की नकल कर रहा है
परिवार की जड़ें जमीं से कुछ इस क़दर उखड़ी है
कि आज पेड़ की हर डाली एक-दूसरे से हिसाब मांग रही है
आज के हम बिखरे पत्ते अपनी जड़ों से दूर
आसमां की उड़ान भरते हैं
आसमां की ऊँचाई में भटक कर
जब घर को लौटते हैं
तो घर हमसे ये सवाल पूछती है
कि कितनी घड़ी के लिए आये हो
जब तुम घर छोड़ कर जाओगे
क्या तुम्हें याद होगा वो चेहरा
जो इस आस में तुम्हें विदा किया था
कि शायद एक मुलाकात फ़िर से होगी
कुछ बातें फिऱ से होगी।
पर वो बातें अधूरी रह गई थी
इतनी अधूरी की उसे मुकम्मल करने को
मैं दरबदर भटकता हूँ।
इस शहर के हर एक बाग बगीचों में
अपने गांव को खोजता रहता हूँ
पर एक गांव से शहर का सफर तो आसान है
एक शहर को गांव तक ना जाने में
ये कैसा अभिमान है?
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