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Showing posts from July, 2026

काश

काश कि यूँही हम - तुम खिलते कि जैसे गुलिस्तां पतझड़ में हम मिट्टी होते सावन में हम बागबान सुबह की तुम सिंदूरी होते शाम की मैं सोता जहाँ काश कि मैं , मैं ना होता काश कि तुम , तुम ना काश कि मन के दीवारें ना होते दिल होता जैसे एक आईना सरहदों के ताले ना होते छत होता ये आसमाँ काश कि नफ़रत गूंगी होती और ईष्या बिना आँखों का ख़यालों के बंदिशे ना होते रिश्ते ना होते कोई कारोबार काश कि मैं , मैं ना होता काश कि तुम , तुम ना