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अंदाज़-ए-बयां

बदल गया है अल्फाज़ अब कहाँ नूर-ए-बयां होता है?
शब्दों के पंख को लगा है जमाना कतरने में।
आज़ाद ज़िस्म है मगर रूह ख़ुद के गिरफ़्त हो चला है,
बेबाक़ बोल भी कुछ इस कदर लगा है बिसरने में।

बदल दोगे अन्दाज़ अगर दूसरों के हिसाब से,
हर एक क़दम ज़िन्दगी की ठोकर सी लगेगी।
भला कौन बता पाया कि ज़िन्दगी कैसे जिया जाए?
हर एक की कहानी अनसुलझी ही लगेगी।

चलोगे सफ़र में तो तन्हाई भी चलेगी,
भीड़ बनने से ख़्वाब मुकम्मल नहीं होता।
छोड़ जाते हैं अक़्सर लोग पद्चिन्हों के निशान,
उन रास्तों पे गुजरने से मंज़िल पूरा नहीं होता।

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