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जहाँ कभी सोया करते थे कई सपने कई आशाएँ

बैठता हूँ उस छत पे अक़्सर बरसाती रात में, बादलों पे भी निशा का रंग चढ़ जाता है, टर्र टर्र हर तऱफ बेंग बोल रहे होते हैं, शुकून लिये कोई झींगुर बंसी बजाता है। उसी छत पे जहाँ शाम को अक़्सर नहाये देखा है सिंदूरी बादल में, जहाँ चाँद को शरमाये देखा बादल के घूँघट में, जहाँ बचपन बीता है बसन्त सी झूमते बेलों सा, जहाँ कभी सोया करते थे कई सपने कई आशाएँ। उसी छत पे जहाँ मैं एक आम और कुछ ताड़ के पेड़ को निहारता था, जो आज इंसानों के भुख का शिकार हो चले हैं। रात के अंधेरों में अक़्सर शैतान का किस्सा मेरी बूढ़ी दादी माँ सुनाती थी, वो सहमी हुई आंखें आज भी निहार आता हूँ, उसी छत पे जहाँ कभी सोया करते थे कई सपने कई आशाएँ। जहाँ से सप्तऋषि को देखता था टिमटिमाते, तब मालूम ना था कि मैं कितनी शदियाँ देख आया हूँ। उसी छत पे जहाँ रात में भी बल्ले भांजा करता था, और विविध भारती ट्यून कर हवा महल घूम आता था। वो दीवाली की उमंगें वो होली के तरंगें, फ़िर से महसूस कर आता हूँ उसी छत पे जहाँ कभी सोया करते थे कई सपने कई आशाएँ।

दरअसल मैं कोई एक आदमी नहीं हूँ

दरअसल मैं कोई एक आदमी नहीं हूँ, मेरे बदलाव का गवाह ज़र्रा ज़र्रा है, और मैं भी उन्ही ज़र्रे में से हूँ, जो टुकड़ों में अस्तित्व को धारण करता है, जिसे मैं का भ्रम भी है और जो ब्रह्मवाण है। ये जो मेरा मन है ना जाने कितने मैं समेटता है? कितने मन को टटोलता है? पहचान तो बस एक मैं धारण किये हुए है, ना जाने कितने पीछे रह जाता है? दोष मत देना कि मैं ऐसा आदमी हूँ, वैसा आदमी हूँ, दरअसल मैं कोई एक आदमी नहीं हूँ... हर बेनाम को नाम देना बस मेरी आदत सी हो गयी है, जो समझ में ना आये उसे पहचान देना ज़रूरत सी बन गयी है, मैं ख़ुद से अज़नबी हूँ, और ख़ुद में अज़नबी हूँ, दरअसल मैं कोई एक आदमी नहीं हूँ...

अभिलाषा

इतनी अभिलाषाएं इतनी आकांक्षाओं पे समर्पण कि बस नशे में निकल गया था पंख की खोज में, पर खोजने को तो भारत निकला था एक भद्र जन, पर मिल गया अमेरिका। हर खोज की यही कहानी है, हर सपने की यही निशानी है, जिसे हम खोजते रहते थे वो मृगमरीचिका निकली, पर जो मिला उसकी कभी अभिलाषा ना थी, पर वही जीवन था! सरल और परिलक्षित! हमने अक़्सर ख़ुद को भूत के झरोखे से देखा है, या भविष्य के कल्पनाओं में खोया है, वर्तमान को हमनें ज़िन्दा निगल लिया है।

How to Live: Anti-Utopian Perspective

I don't have any blueprint and I can not have. I may have certain immidiate purposes to achieve but it has nothing to do with the ultimate end. In fact, there cannot be any pre-decided end. Many times I tried to follow a routine to succeed, each time I failed miserably. Those failures are close to my heart. It is only failures which make me realise that life is not a manifesto to be proclaimed. Life is situational, temporal, here and now. It doesn't mean that I don't have any problem, or I am living with eternal bliss. In fact, I'm full of problems which make me engaged to solve it. Many problems are solved and many more come in between. But I don't think that these problems are itself the problem. Only this conflict deserves to be named as life. I cannot dream a heaven on earth. I cannot imagine a fairytale to come true. Life is what it is obvious to my senses. I witness it, feel it, what else is life. Here is bliss, ceaseless coiling, full of waves, ups and down...

बातों पे कुछ बात हो जाये

कुछ जज़्बात से बात निकलेगी और बातों में बात फैलेगी, जबकि कहने को कुछ भी नहीं है, पर बातों के लिये कोई बात हो ये ज़रूरी तो नहीं। इतने ख़ाली बैठे हैं समय का तकिया सर से टेके, भला ये भी तो एक बात है, बात मुद्दे की ही हो ये ज़रूरी तो नहीं। मुद्दे नहीं मिल रहे हैं तो वे बातों की साईकल चला रहे हैं, कहते हैं, मुद्दे मिल ही जाए ये ज़रूरी तो नहीं। यहाँ हर कोई बोल रहा है, मालूम होता है, सुन तो कोई भी नहीं रहा है, पर बात सुनाने को ही किया जाये ये ज़रूरी तो नहीं। ठहर जाओ, देखो, हर समय-हर जगह बातें हो रही है, अब तुम भी बोलोगे ये ज़रूरी तो नहीं।

Habbit of Reading is hanging in "State of Oblivion"

There is no scope of celebrated academic pursuit. This is the easiest way to colour every single event as useful for knowledge. Knowledge has various dimensions; like ethics, logics, metaphysics, epistemology, and many more. These streams have been in the development much before Greek civilization came into being. And every single civilization which gave importance to the imagination over status quo deserves their name to be remembered for being a stepping stone for the knowledge and liberation from the ignorance; which is inherent in our collective psyche. Academic pursuit is all about breaking the hierarchy of authority and ensuring a level playing field for every single being. For communication plays a decisive role. The role of debate, discussion, and criticism to the accepted believes are key in the progress and development of knowledge. One of the keys of this progress is nothing but the habit of reading the available literatures.  I remember, in one of the conversa...

दुश्मन जो गर जमाना हो जाये

मेरी दोस्ती के क़ाबिल जो हो गए हो तुम, इस काबिलियत से बेहतर होगा तुम दुश्मन के क़ाबिल हो जाओ। तेरी वाह सुनकर मैं आत्ममुग्धि की मौत नहीं मरना चाहता। मुझे उस रावण की जरूरत है जिससे राम के भी शौर्य में चार चाँद लग जाता है। जिसके जीवन में शत्रु ना हो वो जीया ही कहाँ है स्वच्छन्दता से। मानो इस जगत में कोई रोशनी के तेज से अन्धा हो गया हो। उजाले की चाह ना हुआ करती गर रात गहरी नींद में निपट लेता।