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कुछ मिज़ाज ऐसा भी

झोला उठाने का शौक़ीन जहाँ में हैं बहुतेरे,
यहाँ हर कोई बुद्ध सा जलता दीप नहीं होता।

तमन्ना पाल के बैठे हैं ज़िन्दगी शोहरत की लिबाज़ हो,
एक गाँधी बन सका हर गाँधी महात्मा नहीं होता।

कितने ख़ूनी क्रान्ति के सपने लिये जिये और चल बसे,
मार्क्स के दामन में हर कोई क्रांतिकारी नहीं होता।

कितने मन्दिर और मस्जिद के भेंट चढ़ गए,
रक्तपिपशु मानवता का पुजारी नहीं होता।

राजनीति के उठापटक में बात इतनी गिरी,
संख्याओं से राजनीति में खिलाड़ी नहीं होता।

हासिल क्या हो सकता जो पहले ना हुआ?
नक़्क़लची मानव कहलाने का अधिकारी नहीं होता।

नारेबाजों को हक़ीक़त से क्या वास्ता,
शब्दों का ग़रीब कोई अनारी नहीं होता।

जो हवाओं का रुख़ देख पलट जाते हैं,
ज़िन्दगी के हर शाख पे नज़र आते हैं!

ऐसे रंगे शक़्ल के बनावट पे ना जा,
गर्जना करने वाला हर जानवर शिकारी नहीं होता।

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