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सामाजिक परिकल्पनाओं में शिक्षा

शिक्षा व्यवस्था को लेकर अक़्सर बातें होती रहती है। व्यवस्था का बनना और बिखरना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। दुनिया के किसी भी व्यवस्था को समझने का प्रयास किया जाए, एक बात निश्चय ही निकल कर आयेगी कि वो व्यवस्था सम्पूर्णता के शिखर से दूर ही रही थी। क्योंकि सम्पूर्णता के पैमाने एक नहीं हुआ करते। सम्पूर्णता का निर्माण समाज की रीतियाँ और उसके सांस्कृतिक विरासत तय करते हैं। हम अक़्सर आधे-अधूरे विचारों से समावेशी विचारधारा नहीं बना सकते। उसके लिये निरंतर अध्ययन और विरोधाभासों से लड़ना होता है। सम्पूर्णता एक प्रक्रिया है, कोई समापन नहीं जिसे सदा के लिये प्रतिस्थापित किया जा सके! शिक्षा और उससे जुड़ी व्यवस्था का मूल्यांकन उसके नौकरी देनेवाली क्षमता से करना न्यायोचित नहीं हो सकता। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य निर्माण, विखंडन, एवं पुनर्निर्माण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। शिक्षा अंधकार में प्रकाश की ओर अग्रसर करने का सर्वोच्च माध्यम है। शिक्षा जीवन है। शिक्षा स्वतन्त्रता है। शिक्षा से मूल्यवान सम्पदा एवं मूल्य मनुष्य ने अभी तक विकसित नहीं किया है। और नाही किया जा सकेगा। पर ऐसा क्या कारण है कि शिक्षा...

क़ैदी

यादों के साये में अक़्सर एक तस्वीर दिखा करती है,  जिसे बचपन ने अपने हाथों से सजाया था। अब समय की आभा ने हर दिशा में अंधेरे की रौशनी फैला रखी है। तस्वीर तो आज भी लिये घूमता हूँ, फर्क बस इतना है कि इस तस्वीर के रंग मेरे नहीं हैं। किसी की कल्पना में क़ैद हो जाना,  किसी के विचारों का क़ैदी हो जाना, इन्सान आज स्वच्छंद कहाँ है? विचारशील और बेबाक कहाँ है? नीलाम क़लम लिखते हैं आज, तोतें जैसी बोलियां बोली जाती है, विचारों की तारतम्यता में, सत्य की खोज पीछे रह जाती है।

CROSSING THE RUBICON

What really deserves to be named as culture? The one which is enmeshed in violence? The one and only one which is hurried and burried for power and desire to remain with it, uncompromisingly, in words and deeds, in nature and conduct, in passion and reason? Harshness of words, abusive inertia, roaming around, echoing a subversive culture, divided in binary, fighting for nothing. In fact, progress needs no violence, no effort, it flows naturally in flux of time. People are busy on street and in office for nothing. The one, who forgets to swallow in the elixir of life, has wasted it for nothing. No idea is fresh enough to survive eternity. No culture will survive the hurricane of time. The one, who dramatizes to be a protector and guardian of humanity often fails to sail over the other side of river. For creation is an art of nature, and only nature knows its wisdom and its limitations. The one, who pretends to know often fails himself at the moment of necessity, and one, who surrender...

सच्चाई से भला किसे डर नहीं लगता?

हर घड़ी यूँही गुज़ार देता हूँ कि समय तो अभी आया ही नहीं, रफ़्ता रफ़्ता ज़िन्दगी कुछ इस क़दर खर्च हो जाती है। आज की ख़ुशी और आज के ग़म को जीया भी नहीं, और कल का सवेरा एक नया आज लेता हुआ आया है। इंतेज़ार की दरकार में इतनी शदियाँ बीत गयी, पर आज भी ज़न्नत धरा से दूर ही रहा है, ना जाने कौन से फ़लक़ पे जा बसा होगा? हक़ीक़त से सहमी हुई आँखें अक़्सर बता जाती है कि हमें सपनों में जीने की आदत है, सच्चाई से भला किसे डर नहीं लगता?

अधिकारों की राजनीति एवं समाज की परिकल्पना

अधिकार और कर्तव्यों पे आये दिन व्याख्यान सुनने को मिलता है। अक्सर छात्रों से बात भी होती रहती है। मैंने विश्व व्यवस्था को अधिकारों के नारों में झुलसते देखा है। मानवधिकार के छद्म रूप में कॉरपोरेट के पदार्थवादी चरित्र को उभरते देखा है, जिसने मानवाधिकार के चरित्र को मानव से विस्थापित कर विधिक मानव के लिये समर्पित कर दिया है। आज के समय में महामानव की परिकल्पना में विधिक जनित मानव ने सर्वोत्तम स्थान हासिल किया है। ऐसी व्यवस्था को हम विल टु राइट कह सकते हैं, जहाँ अधिकारों की बाज़ी लगी है, और हर कोई कर्तव्यों से पीछा छुड़ाना चाहता है। आप क्रिमिनल लीगल सिस्टम को ही देख लीजिए, हर कोई अपने अधिकारों की बात न्यायालय के समक्ष करता है, पर कभी किसी ने न्यायालय से अपने कर्तव्यों की बात की? ये बताया कि हम अपने कर्तव्यों की माँग करते है? नहीं, अधिकारों में झुलसते बच्चे सड़क पे उतर कर नारे लगाते नज़र आते हैं, "हमारी माँगे पुरी करो"! दूसरी तरफ के लोग भी यही नारे लगाते नज़र आते हैं। होहफेल्ड के अधिकार-उन्मुख विचारों ने समाज की रूप रेखा को बिखरी हुई व्यवस्था बना दिया है जहाँ से समाज अशांति के पथ पे अ...

बेनाम हसरतें

खोजता हूँ कुछ ऐसी राहें जिसपे चलकर हारने की खुशी हो और जीतने का ग़म, जो ले जाये हमें बेनाम से मंज़िल पे, जहाँ मेरे सपने भी क़दमताल से डरते थे। आजकल क़ैद के रिवाज़ मानो कुछ इस क़दर है कि हम क़ैदी भी हो गए और हमें पता भी नहीं चला। इस बागीचे में हर शक़्स कई नाम लिये बेच रहा है, गर ख़रीददार ना मिले तो तोहफ़े में नाम दिए जा रहा है। नाम की चाहत में कितने बादशाह लुटे और लूट गए, जिसे नाम की चाहत ही नहीं वो भला बदनामी के जलसे में कहाँ नीलाम होता है। इतने नाम इतनी शोहरत कि अब ज़िन्दा होने की शक़्ल बदल गयी है, ज़िन्दा तो आज आलिशान महल भी है, पर वो क़ब्रगाह की शक्लोसूरत लिये शैलानीयों के कौतूहलता का गवाह है। ज़िन्दा तो मुर्दे भी होते हैं, बस फ़र्क इतना है कि वो मर के ज़िन्दा हैं, और हम जीते हैं मरे हुए!

कुछ मुलाकातों को हमनें ज़िन्दा रखा

मिलना हुआ ना हुआ कोई ग़म नहीं, मिलने के बहाने जो अभी ज़िन्दा है हमारे जेहन में। कुछ मुलाकातों से बेहतर उसके ख़यालात होते हैं, और बिना मिले ही अफ़साने सुहाने बन जाते हैं। मिलके अक़्सर कल्पना के दीप बुझ जाते हैं, जब मिलता है सच का असली चेहरा। ऐसा क्या है जो सच है और कल्पना भी नहीं है? ऐसी कौन सी कल्पना है जो वास्तविकता से दूर है? मुलाकातों को ज़िन्दा रखने के लिये आओ थोड़ी दूरी बना लें, कि जब मिलें तो वो वक़्त सदियाँ लिये आये, और जब गुज़रे तो एहसास भी ना हो कि हमने कुछ वक़्त साझा किया था।