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बिखरे अस्तित्व का नेपथ्य लिखता हूँ

आज बिना सोचे समझे कुछ शब्द लिखता हूँ,
समझ के समुंदर में नासमझीयों का एक सिलसिला चलता आया था,
आज नादानी भरा एक खत लिखता हूँ।

अर्थ के ढ़ेर में कूड़े-कचरों का सामान ढ़ोता आया था,
आज बैठा हुआ व्यर्थ लिखता हूँ।
आज बिना सोचे समझे कुछ शब्द लिखता हूँ।

बातों में उलझकर बड़ी देर करता आया था,
आज एक कहानी निःशब्द लिखता हूँ।
आज बिना सोचे समझे कुछ शब्द लिखता हूँ।

शब्दों को वज़ह से भरी कहानियों में ख़र्च करता आया था,
आज बेवज़ह बेअर्थ लिखता हूँ।
आज बिना सोचे समझे कुछ शब्द लिखता हूँ।

आँधियों के बवंडर से अन्धे-गुमान सालता आया था,
आज उसके बिखरे अस्तित्व का नेपथ्य लिखता हूँ।
आज बिना सोचे समझे कुछ शब्द लिखता हूँ।

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